मिरगान त्योहार
दिआरी त्योहार
दिसंबर–जनवरी के महीनों में हमारे लोग बड़े आनंद और खुशी के साथ दिआरी त्योहार मनाते हैं। पहले दिन चरवाहे ढोल-नगाड़े और तुरही जैसे बाजों को लेकर घर-घर जाते हैं और गाय-बैल के गले में गेटा नामक धागा बाँधते हैं। इस त्योहार के दौरान हमारे लोग गाय, बैल, भैंस, भैंसी, भेड़ और बकरियों को खुशी-खुशी नहलाते हैं। नहलाने के बाद उन्हें चरने के लिए छोड़ दिया जाता है, ताकि पशु इधर-उधर न भटकें।
गांव के लोग भी नहाकर तैयार होते हैं। बाद में वे चरने की जगह से गाय, बैल, भैंस, भैंसी, भेड़ और बकरियों को वापस घर लाकर अपने-अपने स्थान पर बाँध देते हैं। पशुओं के खाने के लिए खिचड़ी और रोटियाँ बनाई जाती हैं। इनके साथ-साथ अलग-अलग प्रकार की मिठाइयाँ भी बनाई जाती हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग और बच्चे खुशी के साथ पशुओं को खिलाते हैं। इसके बाद सभी लोग मिलकर घर में बने पकवानों को आनंदपूर्वक खाते हैं।
यह उत्सव दूसरे दिन भी चलता है, जिसे गोरधन कहा जाता है। गोरधन का कार्यक्रम रविवार की शाम को होता है। इस समय चरवाहे बाजे, तुरही और देवी-देवताओं के प्रतीकों को लेकर नाचते-गाते चलते हैं और इस प्रकार गोरधन का कार्यक्रम शुरू होता है। वहाँ एक जोड़ी बैल भी लाए जाते हैं।
गोरधन के अवसर पर गांव की महिलाएँ अपने-अपने घरों से टोकरियों में धान (पैडी) लेकर आती हैं और अपने-अपने पशुओं के चरवाहों को देती हैं। चरवाहे प्रत्येक टोकरी से थोड़ा-सा धान उन बैलों को खिलाते हैं और बचा हुआ धान अपनी टोकरी में रख लेते हैं। इसके साथ ही दिआरी त्योहार और गोरधन का कार्यक्रम समाप्त हो जाता है।
नुआ खानी
नुआ खानी त्यौहार भादों मास में मनाया जाता है। यह त्यौहार शुक्रवार के दिन में ही मनाया जाता है। इस त्यौहार में नया धान को खेत से नया कपड़ा में लपेटकर लाया जाता है और इसे पुराने धान के साथ मिलाकर नये मटके में भुना जाता है। इसको कुटकर गुड़ के साथ मिलाया जाता है। बाद मे भीगे हुए चिवड़े को भी अलग से गुड़ के साथ मिलाया जाता है। और शाम के समय घर के सभी लोग एक साथ इकठ्ठे होकर एक दुसरे के चरण स्पर्श करते हैं और एक दुसरे को आशिर्वाद देते हैं।
इसके बाद घर के सभी लोग एक जगह पर बैठकर कुटा हुआ धान को और भीगा हुआ चिवड़ा को कुड़ई पत्ते में रखकर माथे मे टीका लगाते हैं और खाते हैं। और परमेश्वर को धन्यवाद करते हैं। घर के बच्चे और बुजुर्ग नई नई कपड़े पहनकर बाहर निकलते हैं। बड़े बड़े बुजुर्ग लोग एक दुसरे को गमछा आदान प्रदान करते हैं। छोटे छोटे बच्चे लोग मिट्टी से बना हुआ बैल के खिलौने के साथ और लड़की लोग मिट्टी के बर्तन के खिलौने के साथ खेलते है और जवान लड़के लोग लकड़ी का खिलौना जिसे गेड़ी कहा जाता है इसे बनाकर और चढ़कर गांव के अंदर घुमते हैं।
ए सभी कार्यक्रम खतम होने के बाद घर के लोग अछा अछा साग सब्जी बनाकर खाते हैं और एक दुसरे को देते हैं। बासी त्यौहार के दिन में भी सभी लोग धुम धाम के साथ मिठाईयां, मास मटन बनाकर खाते हैं। इस त्यौहार के तिसरे दिन गांव का पुजारी लकड़ी का खिलौना जिसे गेड़ी कहते तोड़ देते है।
मंडी
मंडी, जिसे मिरगन में बाज़ार भी कहते हैं। यह हमारे समुदाय में बहुत लोकप्रिय और मशहूर है। मेला शुरू होने से पहले लोग अपनी देवियों को बाज़ार में लाते हैं। वे अपनी पूजा-पाठ करते हैं। यह फरसीगांव गांव में लगता है, लेकिन आस-पास के गांव भी इसमें शामिल होते हैं, जिससे यह एक जीवंत और सबको साथ लेकर चलने वाला कार्यक्रम बन जाता है। यह मेला सिर्फ़ बाज़ार के बारे में नहीं है, बल्कि समुदाय के जीवन से जुड़ा हुआ है। वे अपने रिश्तेदारों को भी मेले में शामिल होने के लिए बुलाते हैं।
इस मेले के दौरान वे अलग-अलग तरह के पकवान बनाते हैं और अपने परिवारों और रिश्तेदारों के साथ उनका आनंद लेते हैं। साथ ही, बाज़ार में कई स्टॉल लगते हैं जिनमें खिलौने, मिठाइयाँ और फल जैसी कई तरह की चीज़ें मिलती हैं। मनोरंजन के लिए कई तरह के झूले भी होते हैं जो लोगों को बहुत पसंद आते हैं।